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कॉलेजों की स्वायत्ता पर DU के कुछ कॉलेजों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिखा खत

नई दिल्ली : दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ काॅलेजों को स्वायत्ता प्रदान करने की दिशा में मानव संसाधन विकास मंत्रालय व यूजीसी की ओर से जारी प्रयासों को लेकर अब शिक्षकों ने सीधे मंत्रालय से ही इस प्रक्रिया को गैर जरूरी बताते हुए खारिज करने की मांग शुरू कर दी है. दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यकारी परिषद् के सदस्य डाॅ.एके भागी और राजेश गोगना ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडे़कर को पत्र लिखकर कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंद्धता प्राप्त काॅलेजों को स्वायत्ता प्रदान करना विद्यार्थियों के हित में नहीं है.

विद्यार्थियों के हितों का भी रखना होगा ध्यान

इससे स्वायत काॅलेज स्वपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे और सीधे तौर पर गरीब व वंचित वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों के लिए परेशानी का कारण बनेंगे. इतना ही नहीं काॅलेजों को स्वायत्ता मिलने से वह प्रवेश नीति के मोर्चे पर भी दिल्ली विश्वविद्यालय की एकीकृत स्टूडेंट फ्रेंडली दाखिला प्रक्रिया से स्वतंत्र हो जाएंगे जोकि विद्यार्थियों के हित में नहीं है.

क्या लिखा है खत में…
मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे इस पत्र में कार्यकारी परिषद् के सदस्यों ने स्वायत्ता दिलाने की दिशा में अग्रसर काॅलेजों के द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल खडे़ किए हैं. इन सदस्यों ने कहा कि इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णायक संस्थाओं विद्वत परिषद व कार्यकारी परिषद की ओर से लिए गए निर्णय को भी नकारा है. डीयू में विद्वत व कार्यकारी परिषद ने वर्गीकृत स्वायत्ता को नहीं माना है ऐसे में बिना विश्वविद्यालय के अनापत्ति प्रमाण पत्र के काॅलेजों द्वारा स्वायत्ता के लिए आवेदन करना ही अनुचित है. इसी तरह काॅलेजों प्रबंधकों की ओर से इस विषय में अन्य सहभागी फिर वो चाहे शिक्षक हो, कर्मचारी हो या फिर विद्यार्थी, से भी चर्चा नहीं की गई. कार्यकारी परिषद के सदस्यों का कहना है कि यदि ट्रस्ट द्वारा संचालित इन काॅलेजों स्वायत्ता मिल जाती है तो वो दिन दूर नहीं जब स्वायत्त काॅलेजों के नाम पर शिक्षण की दुकाने खुल जाएंगी.

काॅलेजों को स्वायत्ता दिए जाने के विरोध में कार्यकारी परिषद के सदस्य डाॅ.एके भागी व राजेश गोगना ने अपने पत्र में कहा कि अभी डीयू के करीब 60 काॅलेज एक एकीकृत व्यवस्था के अंतर्गत देशभर से आए विभिन्न सांस्कृतिक, आर्थिक व सामाजिक पृृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को एक समान शिक्षा उपलब्ध कराते हैं. इन काॅलेजों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले 12 काॅलेजों को छोड़कर) डीयू के माध्यम से अंडर ग्रेजुएट कोर्सेज चलाने के लिए अनुदान प्रदान करता हैै जिसके परिणामस्वरूप यह काॅलेज कला एवं मानविकी, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान व वाणिज्य इत्यादि का स्नातक स्तर पर अध्ययन कराने में सक्षम है और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश की रीढ़ को मजबूत कर रहे हैं.

ऐसे में स्वायत्त काॅलेजों की यह व्यवस्था इस एकीकृत व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का काम करेगी और दिल्ली विश्वविद्यालय के काॅलेजों के स्तर पर लागू एकरूपता के खत्म होने से सीधे तौर पर सामान्य विद्यार्थियों का ही नुकसान होगा. अपने पत्र में कार्यकारी परिषद् के सदस्यों ने स्पष्ट किया है कि काॅलेजों को स्वायत्ता देने का कदम बेहतरी की दिशा में नहीं है और हमारी मांग है कि यूजीसी द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी भी घटक काॅलेज को स्वायत्ता देने की स्थिति में आवेदन को सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिए. यदि काॅलेजों को यह स्वायत्ता दी जाएगी तो सीधे -सीधे वित्तीय संसाधनों के भूखे ट्रस्ट या राज्य वित्त पोषित इन संस्थानों शिक्षा के बाजारीकरण की दिशा में अग्रसर होेने का बल मिलेगा. ऐसे में जरूरत है कि ऐसे नियम बनाए जाए जिससे की सुनिश्चित हो सके कि स्वायत्ता के नाम पर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के हितों की कोई हानि नहीं होगी. यहां बता दें कि मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे गए इस पत्र की एक प्रति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व दिल्ली विश्वविद्यालय कुलपति को भी भेजी गई है.

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