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यूजीसी खत्म करने पर अकादमिक विद्वानों ने की आलोचना

नई दिल्ली: उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) को खत्म कर उसकी जगह नया एजुकेशन सिस्टम लाने का केंद्र का फैसला अकादमिक विद्वानों को पसंद नहीं आया है, जिसपर उन्होंने यह कहते हुए इस पर सवाल खड़ा किया है कि नेताओं को अकादमिक विषयों में शामिल नहीं होना चाहिए. आपको बता दें कि, पिछले हफ्ते मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूजीसी अधिनियम,1951 को रद्द कर यूजीसी के स्थान पर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) लाने की घोषणा की थी.

मंत्रालय ने नए एजुकेशन सिस्टम को लागू करने के लिए तैयार किए गए ड्राफ्ट को सार्वजनिक कर उस पर संबंधित पक्षों की राय भी मांगी है. ड्राफ्ट के अनुसार आयोग पूरी तरह अकादमिक मामलों पर ध्यान देगा. जेएनयू प्रोफेसर आयशा किदवई ने कहा कि नियमों के अनुसार साफ है कि मंजूरी इस आधार पर नहीं मिलेगी कि किसी खास समय पर यूनिवर्सिटी के पास क्या है बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दशक भर के अंदर निर्धारित लक्ष्यों को उसने हासिल किया या नहीं.

मशहूर अकादमिक जयप्रकाश गांधी ने कहा, ‘नए सिस्‍टम का ढांचा इस प्रकार है कि जिसमें शिक्षा के बारे में फैसलों में राजनीतिक दलों की ज्यादा चलेगी जबकि आदर्श रूप से यह काम शिक्षाविदों और अकादमिक विद्वानों द्वारा होना चाहिए, वे देश को आगे ले जा सकते हैं.’ यूजीसी को खत्म करने के फैसले का विरोध कई अन्य विद्वानों द्वारा भी किया गया है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार कम सरकार और अधिक शासन, ग्रांट संबंधी कार्यों को अलग करना, निरीक्षण राज की समाप्ति, अकादमिक गुणवत्ता पर बल, घटिया एवं फर्जी संस्थानों को बंद करने का आदेश और नए उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम, 2018 (यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग को हटाना) के अहम बिंदु हैं. इस नये कानून को 18 जुलाई से शुरू हो रहे मानसून सत्र में संसद में पेश किया जा सकता है.

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